144 सालों तक बंद रही थी, जगन्नाथ रथयात्रा – जाने इससे जुडी रोचक और दिलचस्प बातें।

Jagannath Rath Yatra

जगन्नाथ रथयात्रा को हम सभी जानते है, जो हर साल बड़ी धूमधाम से निकली जाती है। इस साल कोरोना नियमों के अंतर्गत निकली जायेगी जिसमे ज्यादा श्रद्धालु शामिल नहीं हो पाएंगे। कोरोना वायरस का असर इस बार विश्व प्रसिद्ध भगवान जगन्नाथ जी की रथयात्रा पर भी पड़ा है। पहली बार ऐसा होगा की इस तरह से यह रथ यात्रा निकाली जाएगी। 285 वर्षो के यह लगातार निकाली जा रही है।

हम आपको जगन्नाथ रथयात्रा से जुडी कुछ दिलचस्प बाते बताने वाले है जो शायद आप इसके बारे में नहीं जानते है।

भगवान जगन्नाथ का रथ ऐसा होता है।

Jagannath Rath Yatra

800 साल पुराने इस मंदिर में भगवान कृष्ण को जगन्नाथ के रूप में पूजा जाता है, जिनके लिए एक सूंदर रथ का निर्माण किया जाता है। इस रथ में बलराम और बहन सुभद्रा भी विराजमान होते है। सभी के रथ अलग अलग रंग और ऊंचाई के होते हैं। जिनके नाम ‘तालध्वज, दर्पदलन और ‘पद्म रथ’होते है। ये लाल, हरे रंग नीले रंग के होते है। इसके अलावा भगवान जगन्नाथ के रथ को ‘नंदीघोष’ अथवा ‘गरुड़ध्वज’ कहा जाता है। रथ की ऊंचाई लगभग लगभग 45.6 तक होती है। रथ को बनाने के लिए इसमें खास चयन किया जाता है, जिसके लिए बसंत पंचमी का दिन होता है। रथ बनाने की शुरुआत अक्षय तृतीया के दिन से शुरू होती है।

144 साल तक नहीं हुई थी पूजा

Jagannath Rath Yatra History

इस साल पहली बार ऐसा होगा की 285 सालों में जगन्‍नाथ पुरी जी की रथयात्रा ब‍िना श्रद्धालुओं के न‍िकाली जाएगी। वही एक बार मंदिर के रिकॉर्ड के मुताबिक 2504 में आक्रमणकारियों के चलते मंदिर पर‍िसर को 144 सालों तक बंद रहा गया था उस समय भी भगवान की पूजा और रथयात्रा नहीं निकाली गयी थी। लेकिन तब से लेकर अभी तक हर पर‍िस्थिति में मंदिर की सभी परंपराओं का व‍िध‍िवत् पालन किया जाता रहा है।

ऐसे शुरू हुई रथयात्रा की शुरुआत

Jagannath Rath Yatra History

मान्यताएं है, कि भगवान श्रीकृष्‍ण के अवतार जगन्‍नाथजी की रथयात्रा का पुण्‍य सौ यज्ञों के समान होता है। इसके पीछे एक मान्यता है, की राजा इंद्रद्यूम अपने पूरे पर‍िवार के साथ नीलांचल सागर में रहते थे। एक बार उन्‍हें समुद्र में एक विशालकाय काष्ठ दिखा, जिसके द्वारा विष्णु मूर्ति का निर्माण कराने का निश्चय किया। उन्ही के साथ वृद्ध बढ़ई भी दिखाई द‍िया जो, कोई और नहीं बल्कि विश्वकर्मा भगवान जी थे। उसके बाद यह मंदिर बनाया गया और यात्रा का प्रारम्भ हुआ।

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