शिव जी को क्यों कहते हैं ‘भोलेनाथ’? क्यों की जाती है आधी परिक्रमा – जानिए इनसे जुड़ी मान्यताएँ।

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सावन का महीना चल रहा है, इसमें सभी भक्त अपन अनुसार शिव का पूजन करते है। इस महीने को लेकर हिन्दू धर्म में काफ़ी मान्यताएं है। भगवान शिव को कई नामो से जाना जाता है, उन्हें अनादि, अनंत, अजन्मा माना गया है यानि उनका न कोई आरंभ है न अंत है। न उनका जन्म हुआ है, न वह मृत्यु को प्राप्त होते हैं।

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भगवान शिव को मृत्युलोक का देवता माना जाता है। जिन्हे माहाकाल भी कहा जाता है, भगवान भोलेनाथ संहार के अधिपति होने के बावजूद भी सृजन का प्रतीक हैं। इनसे जुडी कई मान्यताये भी है, जिन्हे लोग मानते है और उनकी पूजा अर्चना भी करते है। 

पंच तत्वों का अधिपति माना गया है।

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शिव भगवान को पंच तत्वों में शिव को वायु का अधिपति भी माना गया है। वायु जब तक शरीर में चलती है, तब तक शरीर में प्राण बने रहते हैं। लेकिन जब वायु क्रोधित होती है तो प्रलयकारी बन जाती है। जब तक शरीर में वायु है, तभी तक शरीर में प्राण होते हैं।

सावन के महीने में भोलेनाथ की विशेष पूजा आराधना होती है, जिसमें उनका जलाभिषेक किया जाता है। उन पर दूध चढ़ाया जाता है, सावन के महीने में भगवान शिव को उनकी हर प्रिय चीजों को अर्पित किया जाता है। इस महीने पूजा अर्चना करने से भगवान भोलेनाथ सभी मनोकामना को पूरा करते है। 

शिव को भोलेनाथ क्यों कहा जाता है?

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भगवान शिव को कई नामों से पुकारा जाता है, जिसमे भोलेनाथ भी है। भोलेनाथ यानी जल्दी प्रसन्न होने वाले देव, भगवान शंकर की आराधना और उनको प्रसन्न करने के लिए विशेष साम्रगी की जरूरत नहीं होती है।उन्हें यदि आप सच्चे मन से याद करते है तो वह आपकी बहुत जल्दी सुनते है। भगवान शिव जल, पत्तियां और तरह -तरह के कंदमूल को अर्पित करने से ही जल्द प्रसन्न हो जाते हैं। इसलिए उन्हें ‘भोलेनाथ’ कहा जाता है।

शिवलिंग की ओर ही नंदी का मुंह क्यों होता है?

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हमेशा आपने देखा है की नंदी का मुँह शिवजी की तरफ होता है। किसी भी शिव मंदिर में हमें पहले शिव के वाहन ‘नंदी’ के दर्शन होते हैं। शिव मंदिर में नंदी देवता का मुंह शिवलिंग की तरफ होता है। इसका कारण यह है कि नंदी शिवजी का वाहन है। नंदी की नजर अपने आराध्य की ओर हमेशा होती है, इसलिए उनके मुँह को उनकी तरफ किया जाता है। नंदी पुरुषार्थ का प्रतीक भी है।

शिवजी को बेलपत्र क्यों चढ़ाया जाता है।

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इसके पीछे कारण है की जब शिव ने विष के घड़े को पिया था, तब उनके विष के प्रभाव को कम करने के लिए देवताओ ने शिवजी के मस्तिष्क पर जल उड़लेना शुरू किया जिससे मस्तिष्क की गर्मी कम हुई। बेल के पत्तों की तासीर भी ठंडी होती है इसलिए शिव जी को बेलपत्र भी चढ़ाया गया। जिससे उन्हें शांति की अनुभूति हुई थी। बेलपत्र और जल से शिव जी का मस्तिष्क शीतल रहता और उन्हें शांति मिलती है।

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